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शनिवार, 30 मई 2020

बलिया जिला के बारे में,बलिया को बागी क्यूँ कहा जाता है | BAGI BALLIA CITY

  बलिया जिला जिला की कहानी -

बलिया जिला के बारे में,बलिया को बागी क्यूँ कहा जाता है | BAGI BALLIA CITY


                
    दोस्तों बलिया जिला के बारे में तो सभी लोग जानते होंगे क्यूंकि बलिया जिला हमारे देश का ऐसा जिला है जो , जब पूरा देश 1942 में अंग्रजो का गुलाम था तब बलिया जिला 19 अगस्त 1942 में आजाद हो गया।  बलिया जिला के क्रांतिकारिओं के आगे अंग्रेज घुटने टेकने पर मजबूर हो गए।  बलिया के क्रांतिकारिओं ने अंग्रजो से लोहा लेकर जेल के दरवाजे खोल दिए और अपने साथियों को अंग्रेजो के चुंगल से छुड़वाया था। इसी लिया बलिया जिला को बागी कहा जाता है।  


    बलिया जिला भारत के राज्य उत्तर प्रदेश के पूर्व में आजमगढ़ मंडल में आता है। बलिया जिला भारत के सबसे पूर्वी जिला है। जिसका मुख्यालय बलिया  शहर है। बलिया के उत्तरी और दक्षिणी सीमा क्रम स सरजू और गंगा नदियों से बनाई जाती है।


       भारत को जब ब्रिटिश शासकों से आजादी मिली तो भारत में सबसे पहले बलिया जिला आजाद हुआ था। यहां के क्रांतिकारियों के तेवर के वजह से इसे बागी बलिया भी कहा जाता है। बलिया का क्षेत्रफल 2981 वर्ग किलोमीटर में फैला है। बलिया की जनसंख्या 2011 के अनुसार 32,23,642 है। यहां उप विभागों की संख्या 6 है। यहां की भाषा भोजपुरी और हिंदी। बलिया की प्रसिद्ध भोजन लिट्टी चोखा है। बलिया जिला का पिन कोड 277001 है।  
             
          एक समय ऐसा था जब बलिया और उसके पास में एक जिला गाजीपुर जो दोनों एक ही जिला हुआ करते थे लेकिन अंग्रेजों के वजह से  बलिया जिला गाजीपुर से 1 नवंबर सन 1879 में अलग हो गया। बलिया के निवासियों ने 1942 के आंदोलन में अंग्रेजी सत्ता को उखाड़ फेंक दिया था।
   
           भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर सिंह इस जिला के निवासी थे। जो एक प्रखर वक्त ,लोकप्रिय राजनेता ,विद्वान लेखक और बेबाक समीक्छाक थे। जो 8 महीने से भी कम समय तक देश के प्रधान मंत्री रहे। उनकी मृत्यु 8 जुलाई 2007 में हुई थी। 
 

बलिया का त्यौहार-


      बलिया के लोग विभिन्न भारतीय त्योहारों का जश्न मनाते हैं। हालांकि यहां के स्थानीय लोगों का सबसे महत्व त्यौहार है चतुर पूजा ,गज पूजा और छठ है
 

   बलिया के प्रसिद्ध स्थान-

 
     बलिया जिला में घूमने के लिए बहुत ही अच्छे अच्छे अस्थान है जैसे  सुरहा ताल 

सुरहा ताल बलिया जिला के पछिम में स्थित है ये गंगा और सरजू के दोआब में गोखुर झील है ये गंगा नदी से बना है यंहा पर बहुत से लोग घूमने के लिया एते है 


 पंछी बिहार बलिया जिला में एक स्थान पंछी बिहार ये अस्थान भी बहुत ही सुन्दर जगह है बलिया के निवासी यंहा पिकनिक मानाने या फिर घूमने के लिया आते है 

 
भिर्गु मंदिर बलिया के प्रसिद्ध अस्थानो में से एक भिर्गु बाबा का मंदिर है जो की ये एक देव स्थान है इसका नाम मैंने घूमने के स्थान में इस लिए लिया की यंहा भी बलिया के निवासी बहुत अधिक मात्रा में प्रति दिन उपस्थित होते है 

बलिया के महापुरुष -

 
बलिया एक ऐसा जिला हिअ जो अंग्रेजो से अपने देश भारत से पहले आजाद हो गया था तो भैया यंहा पर लोकप्रिय हस्तिया तो मिलेंगेहि 
मंगल पांडे
 चित्तू पांडे
 चंद्रशेखर सिंह
 जनेश्वर मिश्रा

गुरुवार, 21 मई 2020

स्वामी विवेका नन्द के जोवन की कहानी | Swami vivekanand biography in hindi

स्वामी विवेका नन्द के जोवन की कहानी 

स्वामी विवेका नन्द के जोवन की कहानी


  स्वामीविवेकानंद अध्यात्म से जुड़ने वाले एक महान ब्यक्ति थे जिनका जन्म कोलकाता में 12  जनवरी 1863 में हुआ था। स्वामीविवेकानंद जी एक वेदांत के विख्यात और बहुत ही प्रभावशाली व्यक्ति थे।  उनके बचपन घर  का नाम बीरेश्वर था पर  उनके बचपन के औपचारिक नाम नरेंद्र नाथ दत्त  था।  तीक्छ्ड़ बुद्धि और विवेक के कारन इन्हे लोग विवेकानंद के नाम से बुलाने लगे। इस लिए उनका नाम स्वामी विवेकानंद हो गया।  उनके पिता का नाम श्री विस्वनाथ दत्त था जो कलकत्ता हाई कोर्ट के वकील थे।  और माता का नाम श्रीमती भुवनेश्वरी देवी थी। और इनके दादा का नाम दुर्गाचरण दत्त था जो की संस्कृत और फारसी के बिद्वान थे। 
स्वामी विवेका नन्द के जोवन की कहानी
swami vivekanand



   स्वामीबिबेकानंद के माता जी भुवनेश्वरी देबि बहुत ही धार्मिक बिचार वाली थी वे भगवान शिव की पूजा करती थी , उनके पिता जी भी धार्मिक बिचार वाले ब्यक्ति थे।  उनके माता और पिता के धार्मिक बिचारों से इनके ऊपर भी भक्ति का भाव उत्पन हुआ। इन्होने 25 साल की उम्र में ही घर छोड़ कर भक्ति भाव में लग गए थे। बिबेकानंद जी बचपन में बहुत ही तेज बूढी के थे और सरारती भी थे।  


      उनके पिता कोलकाता के हाई कोर्ट के वकील थे और उनकी माता जी गृहणी थी।  स्वामी विवेका नन्द जी एक विद्वान ब्यक्ति थे उनके बताये गए बातों को अमल करने से हमें जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कराती है। स्वामी जी के बारे में एक कहानी है -

       विवेकानंद जो को एक बार शिकागो जाना था ,श्री राम कृष्णा परम हंस जी की पत्नी शारदामणि जी से शिकागो जाने के लिए अनुमति लेने गए , उस समाये शारदामणि जी अपने किचन में कुछ काम कर रहीं थी तभी स्वामी जी वंहा पहुंचे और उनके समक्छ खड़ा होकर शिकागो जाने की बारे में बोले और अनुमति मांगे।  माता जी ने उनसे बोलीं यदि मै शिकागो जाने के लिए माना कर दूँ तो क्या तुम नहीं जाओगे स्वामी जी ने कुछ नहीं बोले बस चुप चाप खड़े रहे , फिर माता जी ने उनसे किसी काम से कुछ दूर राखी हुई चाकू स्वामी जी से मांगी बोली , सामने राखी ओ चाकू मुझे देदो।  स्वामी जी ने उस चाकू को उठाये और माता जी को देदीये।  फिर माता जी उन्हें शिकागो जाने की अनुमति दे दिए , बोली तुमने मेरा ये काम किये मई तुम्हे अनुमति देती हूँ।  स्वामी जी कुछ समझ नहीं पाए की बस इतनी सी बात के लिए।  फिर माता जी ने कहा की तुमने चाकू के मुठ के अलावा नोख पाकर कर दिए यानि तुम अपने मन , वचन और कर्म से किसी का बुरा नहीं करना चाहोगे इस लिए मई तुम्हे शिकागो जाने की अनुमति देती हूँ। 

 स्वामी विवेका नन्द जी के बौद्धिक छमता बहुत अच्छी थी। वे अपने बुद्धि और विवेक को इतने अच्छे से बढ़ा रेक थे की वे एक मोती सी किताब को भी कंठस्थ याद कर लेते थे। वे जब खली रहते तो या तो वे कोई किताब पढ़ा करते अन्यथा ध्यान लगाकर बैठा करते थे।  उनकी मृत्यु के बारे में लोगों के अलग अलग गए है कोई कहता है की उनकी मृत्यु दिल के डोरे पड़ने से हुई है और वे कई दिनों से बीमार थे।  पर स्वामी जी की जान सेवा लम्बे समाये से काम करते रहने से उनका सरीर तो बीमार हो गया था लेकिन वे मरने से पहले वे लोगो से बोले की मई ध्यान लगाने जा रहा हूँ मुझे कोई  डिस्टर्ब मत कारना और वे एक कमरे में ध्यान लगाने चले गए लम्बे समाये तक ध्यान लगाने के बाद वे ध्यान समाधी में चले गए और उनका प्राण ब्रह्मरन्ध्रा से बहार निकल गया और वे 4 जुलाई 1902 को सरीर त्याग दिए।